2WD या 4WD ट्रैक्टर: भारत में कौन सा खरीदें?
Aglist Editorial · प्रकाशित 11 Aug 2026 · आखिरी अपडेट 24 Sep 2026
फोर व्हील ड्राइव खरीदने और चलाने दोनों में महंगा है। गीले खेत, ढलान, लोडर और भारी ढुलाई में यह वसूल हो जाता है। सूखे समतल खेत में रोटावेटर के साथ नहीं होता।
4WD ट्रैक्टर पिछले के साथ अगले एक्सल को भी ताकत देता है। पूरा फर्क यही है, और बाकी सब इसी से निकलता है: जहां पकड़ कम है वहां ज्यादा पकड़, सर्विस के लिए ज्यादा पुर्जे, और खरीद पर ज्यादा पैसा। यह वसूल होगा या नहीं, इसका आपके ट्रैक्टर के आधुनिक दिखने से कोई रिश्ता नहीं, आपकी जमीन से पूरा रिश्ता है।
फ्रंट एक्सल की असली कीमत
एक जैसी तुलना हम वहीं दे सकते हैं जहां एक ही मॉडल दोनों ड्राइव में मिलता हो। इस कैटलॉग में ऐसी एक ही जोड़ी है। महिंद्रा जीवो 225 DI 2WD में Rs 4.32-4.53 लाख और जीवो 225 DI 4WD Rs 4.63-4.78 लाख पर लिस्टेड है। यानी 20 एचपी की मशीन पर करीब Rs 25,000-30,000 का फर्क।
मुख्यधारा के 45-55 एचपी ट्रैक्टरों में यह फर्क बड़ा होता है, क्योंकि फ्रंट एक्सल, डिफरेंशियल और भारी अगले टायर, सब मशीन के साथ बढ़ते हैं। हम इस पर कोई प्रतिशत नहीं लिखेंगे, क्योंकि पूरे बाजार का प्रमाणित आंकड़ा हमारे पास नहीं है और मनगढ़ंत आंकड़ा न होने से भी बुरा है। एक ही दिन डीलर से दोनों के लिखित कोटेशन लीजिए और खुद मिलाइए।
इतना जरूर कह सकते हैं कि खरीद का प्रीमियम पूरी लागत नहीं है। चालित फ्रंट एक्सल के साथ एक डिफरेंशियल, ट्रांसफर व्यवस्था, ज्यादा ऑयल सील और दो बड़े अगले टायर जुड़ते हैं जो घिसने पर बदलने होंगे। फैसले से पहले डीलर से फ्रंट एक्सल का सर्विस अंतराल और अगले टायरों की जोड़ी की कीमत पूछ लीजिए।
4WD कहां सचमुच वसूल होता है
गीले और पडल किए खेत। नरम खेत से भरी ट्रॉली निकालकर पक्की सड़क तक लाना 4WD का असली मौका है। पर बारीकी समझिए: पडल किए खेत के बीच में अगले पहिए ज्यादातर सिर्फ मोड़ रहे होते हैं, खींच नहीं रहे, इसलिए 4WD काम कराने से ज्यादा फंसने से बचाता है। वहां केज व्हील और पिछला बैलास्ट ज्यादा मायने रखते हैं, यह हमारी धान और पडलिंग गाइड में समझाया है।
ढलान और सीढ़ीदार खेत। झारखंड के ऊंचे-नीचे उपरी खेत, पहाड़ी और पठारी खेती, कर्नाटक का कॉफी और सुपारी इलाका, सीढ़ीदार अंगूर बाग। यहां 4WD आराम की चीज नहीं, सुरक्षा और पकड़ की जरूरत है।
फ्रंट लोडर का काम। लोडर चलाना है तो 4WD लीजिए। भरी बकेट वजन आगे खींच लेती है और पिछले पहियों से भार हटा देती है, और ठीक उसी समय 2WD खींचना बंद कर देता है। चार पहिया ड्राइव के पक्ष में यह सबसे मजबूत तर्क है।
नरम या ढलान वाली जमीन के बाग और अंगूर। छोटे 4WD ट्रैक्टर इसी के लिए बने हैं: 27 एचपी वाला कुबोटा नियोस्टार B2741S 4WD, 22 एचपी वाला वीएसटी MT 224 1D 4WD, 28 एचपी वाला मैसी फर्ग्यूसन 6028 4WD और 24 एचपी वाला महिंद्रा जीवो 245 DI 4WD। तुलना के लिए पूरी मिनी ट्रैक्टर रेंज देखिए।
कच्ची सड़कों पर भारी ढुलाई। भरी ट्रॉली, गीला रास्ता और आखिर में चढ़ाई। 2WD को बैलास्ट और सावधानी से निकाला जा सकता है। 4WD को निकालने की नौबत ही नहीं आती।
4WD कहां पैसे की बर्बादी है
हल्की सूखी मिट्टी। राजस्थान के बड़े हिस्से जैसी रेतीली और शुष्क जमीन आमतौर पर 2WD को नहीं हराती। राजस्थान मात्रा के हिसाब से देश का तीसरा सबसे बड़ा ट्रैक्टर बाजार है और वहां खरीद मुख्यतः 35-50 एचपी में होती है, बिना चार पहिया ड्राइव के।
ज्यादातर खड़े रहकर पीटीओ का काम। थ्रेशर, चारा मशीन या पंप को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने पहिए चालित हैं। अगर आपका ट्रैक्टर ज्यादातर घंटे किसी खड़ी मशीन से बेल्ट जोड़कर बिताता है, तो आप ऐसा एक्सल खरीद रहे हैं जिस पर कभी लोड नहीं आएगा।
समतल, अच्छी निकासी वाले खेत। समतल जमीन पर पकड़ की ज्यादातर शिकायतें पिछला बैलास्ट, सही टायर प्रेशर और औजार की ठीक सेटिंग से हल हो जाती हैं, और तीनों फ्रंट एक्सल से कहीं सस्ते हैं।
तंग बजट, जहां वही पैसा कुछ बेहतर दिला सकता है। क्लास के हिसाब से Rs 30,000 से Rs 1 लाख तक में ऑयल इमर्स्ड ब्रेक, बेहतर गियरबॉक्स, या सीधे कम कर्ज आ सकता है। पांच साल में यह फर्क आपकी मासिक किस्त पर क्या असर डालता है, यह हमारी ट्रैक्टर लोन और ईएमआई गाइड में देखिए।
4WD का पैसा देने से पहले, पकड़ मुफ्त में ठीक करके देखिए
पकड़ की बहुत सी शिकायतें असल में सेटिंग की गड़बड़ी होती हैं। पहले ये चार चीजें देखिए:
- पिछले टायर का प्रेशर। खेत का प्रेशर और सड़क का प्रेशर एक नहीं होते, और नरम जमीन में ज्यादा हवा भरा टायर जरूरत से बहुत कम जगह पकड़ता है।
- बैलास्ट। पिछले टायरों में पानी या कास्ट वजन ठीक वहीं भार डालते हैं जहां चाहिए। यह सबसे सस्ती पकड़ है।
- टॉप लिंक की सेटिंग। माउंटेड औजार पर टॉप लिंक ड्राफ्ट बदलता है, और सही सेटिंग पिछले पहियों को उठाने के बजाय उन पर वजन डालती है।
- ट्रॉली के लिए ड्रॉबार की ऊंचाई। ऊंचा हिच पॉइंट आगे उठाता है और साथ ही पिछले एक्सल से भार हटाता है।
अगर ये चारों सही हैं और फिर भी फिसलन है, तब आपके पास 4WD का असली मामला है।
सब्सिडी वाला पहलू जो ज्यादातर खरीदार चूक जाते हैं
एसएमएएम की ट्रैक्टर सब्सिडी में एक ही पीटीओ एचपी बैंड में 4WD की सीमा 2WD से ज्यादा है। 20-40 पीटीओ एचपी के ट्रैक्टर पर सामान्य श्रेणी के किसान के लिए 2WD पर करीब Rs 2.00 लाख और 4WD पर Rs 2.40 लाख की सीमा है; आरक्षित श्रेणियों में 50% पर यह करीब Rs 2.50 लाख से Rs 3.00 लाख बनती है। ये सीमाएं 2018-19 के दिशानिर्देशों से हैं और बाद में बदली हो सकती हैं, इसलिए भरोसा करने से पहले मौजूदा आंकड़ा जांच लीजिए। प्रक्रिया और आवंटन की असली दिक्कतें हमारी सब्सिडी गाइड में हैं।
डीलर के यहां क्या जांचें
- ड्राइव लगाकर और हटाकर, दोनों तरह से ट्रैक्टर को पूरा घुमाकर देखिए। हर मॉडल की फ्रंट एक्सल ज्यामिति अलग होती है, और हेडलैंड पर मुड़ने का घेरा रोज आपके साथ रहेगा।
- पूछिए कि 4WD चलते-चलते लगता है या सिर्फ खड़े होकर, और यह मैकेनिकल है या इलेक्ट्रो-हाइड्रोलिक।
- देखिए कि आपके मौजूदा औजार लगाने और उठाने पर फ्रंट एक्सल से टकराते तो नहीं।
- अगले टायरों की कीमत पूछिए। ये सस्ते नहीं होते और हर ब्रांड में एक ही नाप के भी नहीं होते।
हमारी राय
सीधी बात यह है। अगर आपकी जमीन समतल और सूखी है और सबसे भारी काम रोटावेटर और ट्रॉली है, तो 2WD लीजिए और बचा पैसा ब्रेक, गियरबॉक्स या छोटी लोन अवधि पर लगाइए। 45 एचपी वाला कुबोटा MU4501 2WD और मुख्यधारा का 41-50 एचपी 2WD खेमा ज्यादातर भारतीय जोतों के लिए जरूरत से ज्यादा है।
अगर आप गीली जमीन, ढलान या लोडर के साथ काम करते हैं तो 4WD लीजिए और ज्यादा सोचिए मत। Rs 9.15 लाख वाला 55 एचपी का फार्मट्रैक 60 पॉवरमैक्स 4WD, 2,500 किलो लिफ्ट के साथ, इस कैटलॉग का पूरे आकार वाला 4WD है, और सही खेत के लिए यह महंगा है ही नहीं।
पहले कितनी एचपी चाहिए तय कीजिए। ड्राइव का सवाल दूसरा है, पहला नहीं, और जो खरीदार यह क्रम उलट देते हैं वे अक्सर जरूरत से ज्यादा ट्रैक्टर और जरूरत से कम गियरबॉक्स लेकर लौटते हैं।