करतार ट्रैक्टर प्राइस लिस्ट सितंबर 2026 — सभी मॉडल

करतार एग्रो 1974 से पंजाब के संगरूर में कटाई की मशीनें बना रही है, और गेहूँ की पट्टी में इस नाम का वज़न है। अप्रैल में मालवा के ज़िलों में चलते कंबाइन देखे हों तो उनमें करतार ज़रूर रहे होंगे।

चार लिस्टिंग पूरी रेंज बताती हैं। करतार 4000 सबसे बड़ी मशीन है — 101 एचपी छह सिलेंडर सेल्फ-प्रोपेल्ड कंबाइन, 14 फुट कटर बार, 2640 लीटर ग्रेन टैंक, ₹21.50 से ₹26.25 लाख। 4000 मक्का वही मशीन है, मक्का हेडर और 12 फुट बार के साथ, ₹27.50 लाख — बिहार, एमपी और कर्नाटक के मक्का ज़िलों के लिए। 3500 छोटा पहिया कंबाइन है, 74 एचपी, 9.75 फुट बार, 1900 लीटर टैंक, ₹18.70 लाख। स्ट्रॉ रीपर 56 ट्रैक्टर से खिंचने वाली मशीन है, ₹2.95 लाख — यही गेहूँ की ठूँठ को जलाने की समस्या से बेचने लायक भूसे में बदलती है।

किराए पर चलाने वाले के लिए 4000 का 14 फुट बार ही असली आँकड़ा है। चौड़ा बार यानी रोज़ ज़्यादा एकड़, और रोज़ के एकड़ से ही कर्ज़ उतरता है।

कमी भूगोल की है। करतार का सर्विस और पुर्जों का नेटवर्क पंजाब-हरियाणा के इर्द-गिर्द बना है। दो हफ्ते की कटाई में मशीन खड़ी हो जाए तो नुकसान भारी है।

4मॉडल
₹ 2.95 लाखशुरुआती कीमत
1974स्थापना
Sangrur, Punjabमुख्यालय

करतार हार्वेस्टर — कीमत 2026

मॉडलएचपीकीमतएगलिस्ट स्कोर
Kartar 4000 101 ₹ 21.5 लाख – ₹ 26.25 लाख 6.9/10
Kartar 4000 Maize 101 ₹ 27.5 लाख 5.4/10
Kartar 3500 74 ₹ 18.7 लाख 5.1/10
Kartar Straw Reaper 56 ₹ 2.95 लाख 6.8/10

करतार — राज्य के अनुसार

ब्रांड

करतार — अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

करतार 4000 कंबाइन हार्वेस्टर की कीमत क्या है?

कॉन्फ़िगरेशन के हिसाब से ₹21.50 से ₹26.25 लाख। यह 101 एचपी छह सिलेंडर सेल्फ-प्रोपेल्ड कंबाइन है, 14 फुट कटर बार और 2640 लीटर ग्रेन टैंक के साथ। चौड़ा बार ही इसे किराए पर चलाने लायक बनाता है, क्योंकि रोज़ के एकड़ से ही पैसा निकलता है।

करतार 3500 या 4000 - कौन सा लें?

3500 (₹18.70 लाख) 74 एचपी, 9.75 फुट बार और 1900 लीटर टैंक वाली मशीन है — अपनी और आसपास की ज़मीन काटने वालों के लिए ठीक। 4000 कम से कम ₹2.8 लाख महँगा है पर 14 फुट बार से रोज़ कहीं ज़्यादा रकबा कटता है, जो सिर्फ किराए पर चलाने वालों के काम आता है।

करतार स्ट्रॉ रीपर 56 क्या काम करता है?

यह ₹2.95 लाख की ट्रैक्टर से खिंचने वाली मशीन है जो कंबाइन कटाई के बाद बचा गेहूँ का डंठल उठाकर भूसा बनाती है, जिसे चारे के तौर पर बेचा जा सकता है। ठूँठ जलाने की जगह उससे कमाई होती है, और पंजाब-हरियाणा में पराली के नियमों से भी बचाव रहता है।